भावनात्मक नहीं, कानूनी बिन्दुओं पर हो जिरह

नई दिल्ली। देश में अवैध रूप से रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों को देश से बाहर निकालने वाले हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट 13 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। कोर्ट ने साफ किया है कि दलीलें भावनात्मक पहलूओं पर नहीं बल्कि कानूनी बिन्दुओं पर आधारित होनी चाहिए। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मानवीय पहलू और मानवता के प्रति चिंता के साथ-साथ परस्पर सम्मान होना भी जरूरी है। केंद्र सरकार ने पिछले 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था और देश में अवैध रूप से रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों से देश को खतरा बताया था। 16 पन्ने के इस हलफनामे में केंद्र ने कहा कि कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क हैं। ऐसे में ये देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं और इन अवैध शरणार्थियों को भारत से जाना ही होगा। रोहिंग्या मुस्लिमों के पक्ष में दायर की गई याचिका में केंद्र के इस रूख का विरोध किया कि याचिका न्यायालय में विचार योग्य नहीं है। चीफ जस्टिस दीपक्ष मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने दोनों पक्षों से कहा है कि केंद्र और दो रोहिंग्या याचिकाकर्ताओं कोर्ट की मदद के लिये सारे दस्तावेज और अंतरराष्ट्रीय कंवेन्शन का विवरण तैयार करें। (शेष पेज 8 पर) रोहिंग्या शरणार्थियों ने अपनी याचिका में केंद्र सरकार के कदम को समानता के अधिकार के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा है कि हम गरीब हैं और मुसलमान हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा किया जा रहा है। रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को भारत से बाहर निकाले जाने के सरकार के कदम पर समुदाय ने कोर्ट में अर्जी देकर कहा है कि उनका आतंकवाद और किसी आतंकी संगठन से कोई लेना-देना नहीं है।